राकेश कुमार आर्य

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भारत बन्द या भ्रष्टाचार बन्द

Posted On: 30 Nov, 2016 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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देश में कालेधन के विरूद्घ निर्णायक युद्घ छिड़ गया है। कुछ लोगों ने इस निर्णायक युद्घ के विरूद्घ अपना युद्घ छेडऩे का मन बनाया है। कालेधन के विरूद्घ युद्घ एक व्यवस्था के विरूद्घ युद्घ है और एक ऐसी व्यवस्था के विरूद्घ युद्घ है जो इस देश में अंग्रेजों के काल में विकसित की गयी। उस व्यवस्था में प्रशासन अंग्रेजों का होता था जो देश को भीतर ही भीतर खोखला करने के लिए दोनों हाथों से लूट मचाता था। जब अंग्रेजों ने इस देश में रहकर किस प्रकार लूट मचायी थी उससे अपनी असहमति प्रकट करते हुए बिल डूरेण्ट ने लिखा है कि यह सत्य है कि हिमालय जैसे पर्वत की बाधा होते हुए भी भारत ने हमें स्मरणीय उपहार दिये हैं। यथा तर्कशास्त्र, दर्शन, व्याकरण, कथा-साहित्य, सम्मोहन विद्या तथा शतरंज का खेल। हमारी अंकगणना तथा दशमलव पद्घति भी भारत की देन है। तथापि यह सारे ज्ञान विज्ञान भारत की मूल चेतना नहीं है। भविष्य में हम भारत से क्या सीख सकते हैं-उसकी तुलना में तब जो कुछ हमने सीखा है वह अति सामान्य ही था। जब वैज्ञानिक आविष्कार तथा उद्योगधंधों ने दो महाद्वीपों को एक दूसरे के निकट ला दिया और इन्हीं कारणों से यूरोप और एशिया में परस्पर संघर्ष भी हो रहा है तो हम भारतीय सभ्यता का अधिक निकटता से अध्ययन कर सकेंगे और विरोधभाव रखते हुए भी इस देश के कुछ भावों और तौर तरीकों को ग्रहण कर सकेंगे। हमने पूर्वीय देशों पर विजय पायी है, परिणाम स्वरूप हममें तो अक्खड़पना तथा लूटमखसोट का भाव आया है। शायद भारत के संपर्क से हम परिपक्व मस्तिष्क की सहनशीलता भद्रता आदि गुण सीखें। इस संतोष से हम संतोष की सीख लेकर उसके अनुसार अपने (यूरोपीयन) समाज की रचना करें।
कहने का अभिप्राय है कि अंग्रेजों की शासन व्यवस्था को उन्हीं के ऐसे लोगों ने ‘लूटमखसोट की व्यवस्था’ घोषित किया जो देश के लोगों के साथ ‘अक्खड़पन के व्यवहार’ को अनुचित मानते थे और अंग्रेज होकर भी गंभीर विवेकपूर्ण चिंतन रखते थे। जब देश आजाद हुआ तो इस देश की शासन व्यवस्था पर ऐसे लोगों ने तेजी से अपना शिकंजा कसा जो ‘लूटमखसोट तथा अक्खड़पने’ की राजनीति में विश्वास करते थे। यही कारण रहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के काल में ही देश में ‘जीप घोटाला’ हो गया। देश का शासन-प्रशासन और देश का उद्योगपति देश को मिलकर लूटने लगे। परिणाम ये आया कि देश के अधिकांश आर्थिक संसाधनों पर मुट्ठी पर लोगों का वर्चस्व स्थापित हो गया।
इस वर्चस्व को तोडऩे के लिए फिर एक क्रांति की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। देश के विचारशील और गंभीर लोगों की आवाज को अपना सुर दिया-बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे राष्ट्र संतों ने। इनकी आवाज गूंजी तो क्रांति का बिगुल बज गया। देश तप के लिए तैयार हो गया। पर ये दोनों ही नायक यह कह चुके थे कि उन्हें राजनीतिक नेतृत्व की चाह नहीं है, वह चाहते हैं कि देश की राजनीति से बेईमानों को और भ्रष्टाचारियों को निकाल बाहर किया जाए। बाबा रामदेव जी ने कहीं अधिक ऊंची और स्पष्ट आवाज में देश के ‘बेईमान राजनीतिज्ञों’ को सबक सिखाने के लिए जनता को प्रेरित किया। उन्होंने न केवल अपने भाषणों से ऐसा कार्य किया अपितु देश में चिकित्सा क्षेत्र में तथा खाद्य पदार्थों के निर्माण में किस प्रकार की लूट और मिलावट का बाजार गर्म था उसके विरूद्घ भी देश की जनता को जगाकर रख दिया। देश की जनता की आंखें उस समय खुली की खुली रह गयीं-जब उसने देखा कि देश के लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली दवाइयों के निर्माण में तथा मिलावटी और विषाक्त खाद्य पदार्थों के निर्माण तक में कहीं न कहीं राजनीति खड़ी थी। तब लोगों का राजनीति से विश्वास भंग हो गया। सचमुच मोदी के आने से पूर्व राजनीति, विश्वास भंग के अपने सबसे निम्नतम बिन्दु पर थी। राजनीतिज्ञ इतने आभाहीन हो चुके थे कि उन्हें अपनी सभाओं में भीड़ लाने के लिए अभिनेता और अभिनेत्रियों को बुलाना पडऩे लगा था। यह दुर्भाग्यपूर्ण बात थी कि राजनीति के ‘नाटककारों को अभिनय के नाटककारों’ का सहारा लेना पड़ रहा था। सारे देश की  सारी व्यवस्था ही ‘नौटंकी’ बनकर रह गयी थी।
अंधकार की इसी गहन निशा में नरेन्द्र मोदी का उदय हुआ। देश की जनता ने अंग्रेजी काल से चली आ रही लूटमखसोट और ‘अक्खड़पन की राजनीति’ से मुक्ति पाने के लिए मोदी की ओर आशाभरी नजरों से देखा। मोदी ने भी कह दिया कि अब अभिनय के नाटककारों के दिन लट गये हैं, अब राजनीति को कुछ ठोस आयाम देने होंगे। बाबा रामदेव जी ने मोदी की बात पर विश्वास किया और अपनी क्रांति का झण्डा मोदी के हाथ में वैसे ही सौंप दिया जैसे चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को सौंप दिया था।
इतिहास करवट लेने लगा। लोगों ने राजनीति पर भरोसा किया और उस भरोसे के भरोसे देश की बागडोर मोदी को सौंपने का जनादेश दिया। आज इस जनादेश की मूल भावना के अनुसार मोदी ने अपना कार्य करना आरंभ कर दिया है। देश की जनता से उन्होंने वायदा किया था कि ‘बेईमानों से विमुक्त राजनीति’ करके ही दम लूंगा। इसके लिए कालेधन और भ्रष्टाचार पर रोक लगाना अनिवार्य था। मोदी ने शिकंजा कसा है तो शिकंजे में फंसने वाले लोगों को अपार कष्ट हो रहा है, इसलिए वे ‘भारतबंद’ की बात कर रहे हैं। अब उन्हें यह कौन समझाये कि भारत तो स्वयं नहीं चाहता कि वह बंद हो वह तो भ्रष्टाचार बंद हो-यह चाहता है। विपक्ष को चाहिए कि वह ‘भ्रष्टाचार बंद कैसे हो’-इस पर अपना दर्शन स्पष्ट करे। नौटंकी से आज के भारत को बहकाना या भ्रमित करना संभव नही है, क्योंकि इसके जागरण में अब निस्वार्थ लोगों का और राष्ट्रसंतों का योगदान है। अब भारत बंद नहीं होगा-अब तो भ्रष्टाचार ही बंद होगा। हर देशवासी यही चाहता है।

देश में कालेधन के विरूद्घ निर्णायक युद्घ छिड़ गया है। कुछ लोगों ने इस निर्णायक युद्घ के विरूद्घ अपना युद्घ छेडऩे का मन बनाया है। कालेधन के विरूद्घ युद्घ एक व्यवस्था के विरूद्घ युद्घ है और एक ऐसी व्यवस्था के विरूद्घ युद्घ है जो इस देश में अंग्रेजों के काल में विकसित की गयी। उस व्यवस्था में प्रशासन अंग्रेजों का होता था जो देश को भीतर ही भीतर खोखला करने के लिए दोनों हाथों से लूट मचाता था। जब अंग्रेजों ने इस देश में रहकर किस प्रकार लूट मचायी थी उससे अपनी असहमति प्रकट करते हुए बिल डूरेण्ट ने लिखा है कि यह सत्य है कि हिमालय जैसे पर्वत की बाधा होते हुए भी भारत ने हमें स्मरणीय उपहार दिये हैं। यथा तर्कशास्त्र, दर्शन, व्याकरण, कथा-साहित्य, सम्मोहन विद्या तथा शतरंज का खेल। हमारी अंकगणना तथा दशमलव पद्घति भी भारत की देन है। तथापि यह सारे ज्ञान विज्ञान भारत की मूल चेतना नहीं है। भविष्य में हम भारत से क्या सीख सकते हैं-उसकी तुलना में तब जो कुछ हमने सीखा है वह अति सामान्य ही था। जब वैज्ञानिक आविष्कार तथा उद्योगधंधों ने दो महाद्वीपों को एक दूसरे के निकट ला दिया और इन्हीं कारणों से यूरोप और एशिया में परस्पर संघर्ष भी हो रहा है तो हम भारतीय सभ्यता का अधिक निकटता से अध्ययन कर सकेंगे और विरोधभाव रखते हुए भी इस देश के कुछ भावों और तौर तरीकों को ग्रहण कर सकेंगे। हमने पूर्वीय देशों पर विजय पायी है, परिणाम स्वरूप हममें तो अक्खड़पना तथा लूटमखसोट का भाव आया है। शायद भारत के संपर्क से हम परिपक्व मस्तिष्क की सहनशीलता भद्रता आदि गुण सीखें। इस संतोष से हम संतोष की सीख लेकर उसके अनुसार अपने (यूरोपीयन) समाज की रचना करें।

कहने का अभिप्राय है कि अंग्रेजों की शासन व्यवस्था को उन्हीं के ऐसे लोगों ने ‘लूटमखसोट की व्यवस्था’ घोषित किया जो देश के लोगों के साथ ‘अक्खड़पन के व्यवहार’ को अनुचित मानते थे और अंग्रेज होकर भी गंभीर विवेकपूर्ण चिंतन रखते थे। जब देश आजाद हुआ तो इस देश की शासन व्यवस्था पर ऐसे लोगों ने तेजी से अपना शिकंजा कसा जो ‘लूटमखसोट तथा अक्खड़पने’ की राजनीति में विश्वास करते थे। यही कारण रहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के काल में ही देश में ‘जीप घोटाला’ हो गया। देश का शासन-प्रशासन और देश का उद्योगपति देश को मिलकर लूटने लगे। परिणाम ये आया कि देश के अधिकांश आर्थिक संसाधनों पर मुट्ठी पर लोगों का वर्चस्व स्थापित हो गया।

इस वर्चस्व को तोडऩे के लिए फिर एक क्रांति की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। देश के विचारशील और गंभीर लोगों की आवाज को अपना सुर दिया-बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे राष्ट्र संतों ने। इनकी आवाज गूंजी तो क्रांति का बिगुल बज गया। देश तप के लिए तैयार हो गया। पर ये दोनों ही नायक यह कह चुके थे कि उन्हें राजनीतिक नेतृत्व की चाह नहीं है, वह चाहते हैं कि देश की राजनीति से बेईमानों को और भ्रष्टाचारियों को निकाल बाहर किया जाए। बाबा रामदेव जी ने कहीं अधिक ऊंची और स्पष्ट आवाज में देश के ‘बेईमान राजनीतिज्ञों’ को सबक सिखाने के लिए जनता को प्रेरित किया। उन्होंने न केवल अपने भाषणों से ऐसा कार्य किया अपितु देश में चिकित्सा क्षेत्र में तथा खाद्य पदार्थों के निर्माण में किस प्रकार की लूट और मिलावट का बाजार गर्म था उसके विरूद्घ भी देश की जनता को जगाकर रख दिया। देश की जनता की आंखें उस समय खुली की खुली रह गयीं-जब उसने देखा कि देश के लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली दवाइयों के निर्माण में तथा मिलावटी और विषाक्त खाद्य पदार्थों के निर्माण तक में कहीं न कहीं राजनीति खड़ी थी। तब लोगों का राजनीति से विश्वास भंग हो गया। सचमुच मोदी के आने से पूर्व राजनीति, विश्वास भंग के अपने सबसे निम्नतम बिन्दु पर थी। राजनीतिज्ञ इतने आभाहीन हो चुके थे कि उन्हें अपनी सभाओं में भीड़ लाने के लिए अभिनेता और अभिनेत्रियों को बुलाना पडऩे लगा था। यह दुर्भाग्यपूर्ण बात थी कि राजनीति के ‘नाटककारों को अभिनय के नाटककारों’ का सहारा लेना पड़ रहा था। सारे देश की  सारी व्यवस्था ही ‘नौटंकी’ बनकर रह गयी थी।

अंधकार की इसी गहन निशा में नरेन्द्र मोदी का उदय हुआ। देश की जनता ने अंग्रेजी काल से चली आ रही लूटमखसोट और ‘अक्खड़पन की राजनीति’ से मुक्ति पाने के लिए मोदी की ओर आशाभरी नजरों से देखा। मोदी ने भी कह दिया कि अब अभिनय के नाटककारों के दिन लट गये हैं, अब राजनीति को कुछ ठोस आयाम देने होंगे। बाबा रामदेव जी ने मोदी की बात पर विश्वास किया और अपनी क्रांति का झण्डा मोदी के हाथ में वैसे ही सौंप दिया जैसे चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को सौंप दिया था।

इतिहास करवट लेने लगा। लोगों ने राजनीति पर भरोसा किया और उस भरोसे के भरोसे देश की बागडोर मोदी को सौंपने का जनादेश दिया। आज इस जनादेश की मूल भावना के अनुसार मोदी ने अपना कार्य करना आरंभ कर दिया है। देश की जनता से उन्होंने वायदा किया था कि ‘बेईमानों से विमुक्त राजनीति’ करके ही दम लूंगा। इसके लिए कालेधन और भ्रष्टाचार पर रोक लगाना अनिवार्य था। मोदी ने शिकंजा कसा है तो शिकंजे में फंसने वाले लोगों को अपार कष्ट हो रहा है, इसलिए वे ‘भारतबंद’ की बात कर रहे हैं। अब उन्हें यह कौन समझाये कि भारत तो स्वयं नहीं चाहता कि वह बंद हो वह तो भ्रष्टाचार बंद हो-यह चाहता है। विपक्ष को चाहिए कि वह ‘भ्रष्टाचार बंद कैसे हो’-इस पर अपना दर्शन स्पष्ट करे। नौटंकी से आज के भारत को बहकाना या भ्रमित करना संभव नही है, क्योंकि इसके जागरण में अब निस्वार्थ लोगों का और राष्ट्रसंतों का योगदान है। अब भारत बंद नहीं होगा-अब तो भ्रष्टाचार ही बंद होगा। हर देशवासी यही चाहता है।



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