राकेश कुमार आर्य

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उत्तर प्रदेश किसका हो

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उत्तर प्रदेश किसका हो
उत्तर प्रदेश में अगली सरकार कौन बनाएगा और कौन बनेगा मुख्यमंत्री? यह प्रश्न इस समय सभी के मन-मस्तिष्क में रचा-बसा है। इस प्रश्न को हम जब उठाते हैं तो राजनीति आरंभ हो जाती है अर्थात कोई कहता है कि सपा के अखिलेश ही पुन: मुख्यमंत्री बनेंगे तो कोई कहता है कि अगली सरकार मायावती बनाने जा रही हैं, तो किसी का कहना होता है कि भाजपा अपने बलबूते  पर यू.पी. को जीतने जा रही है, दो चार लोग कांग्रेस को भी अगली सरकार बनाते देखने की बात करते आपको मिल जाएंगे। इन सबके अपने-अपने गुणा-भाग और जोड़-घटाव हैं, जिनके अनुसार ये लेाग अपनी पार्टी की सरकार बनाते हुए दीख जाते हैं।
वास्तव में भारत की राजनीति 1947 से ही एक गलत राह पर चली गयी थी और आज भी यह बहुत से निर्णय उसी गलत राह पर खड़े रहकर ही लेना चाहती है। इसने तुष्टिकरण और ‘वोट बैंक’ की राजनीति अपनाकर पहले दिन से ही गलत रास्ते पर जाने का संकेत दिया था और आज भी यह उसी अंधेरी गली में खड़ी हुई है। अल्पसंख्यकों के नाम पर जिन लोगों का ‘वोट बैंक’ कांग्रेस ने बार-बार भुनाया, उन्हें आधुनिक शिक्षा से काटकर ‘मजहबी तालीम’ के खूंटे से बांधे रखा, जिससे वे मजहबी दुनिया से बाहर निकलकर सोचने की शक्ति गंवाये रहें और देश की तथाकथित हिंदूवादी शक्तियों का डर दिखाकर उन्हें एक बनाये रखकर उनके वोट प्राप्त किये जाते रहें। इस प्रकार ये मुस्लिम अल्पसंख्यक जहां अपने कठमुल्लाओं से परेशान थे जो कि इन्हें मजहबी दुनिया से बाहर निकलने के हर दरवाजे को बंद करके बैठे थे और जो मुसलमानों का परिचय आधुनिक शिक्षा और विज्ञान से करा सकते थे, मुसलमानों के लिए वैसा ही प्रबंध भारत में कांग्रेस और उसकी समान विचारधारा की पार्टियों ने कर दिया, अर्थात ये कांगे्रस या उसकी विचारधारा के राजनीतिक दल मुसलमानों के लिए एक प्रकार से नये और ‘राजनीतिक कठमुल्ला’ पैदा हुए। जिन्होंने मुस्लिमों की मजहबी भावनाओं का जमकर प्रयोग किया। यह सच है कि मुस्लिमों को कंाग्रेस और उसकी समान विचारधारा के दलों ने केवल ‘वोट बैंक’ के रूप में ही प्रयोग किया है। सपा और बसपा दोनों कांग्रेस के दिखाये रास्ते पर आगे बढ़ीं और उन्होंने कांग्रेस से अपने आपको (मुस्लिमों के प्रति) कुछ अधिक ‘उदार’ दिखाते हुए और दो कदम आगे जाकर उनका तुष्टिकरण करना आरंभ कर दिया। सपा इसमें सबसे आगे चली गयी।
अब 2017 के चुनाव आसन्न हैं। इसके लिए फिर ‘वोट बैंक’ की राजनीति आरंभ हो गयी है। बड़ी तेजी से समाज में वोटों के धु्रवीकरण की प्रक्रिया तेज की जा रही है, भाजपा हर बार की भांति इस बार भी ‘राम’ की शरण में चली गयी है, और ‘रोम वाले’ अर्थात कांग्रेसी अभी-दोराहे पर खड़े हैं उनका नेतृत्व ही ऐसा है जो एक ठोस निर्णय लेकर द्वंद्व के दोराहे में फंसा खड़ा है। अभी तक का सारा खेल तो रीता बहुगुणा के भाजपा में शामिल होने से बिगड़ गया है। रीता बहुगुणा कांग्रेस की कद्दावर राजनीतिज्ञ रही हैं, उनमें सोचने-समझने और निर्णय लेने की क्षमता थी। पर पार्टी उनका सदुपयोग नही कर पायी और वह भाजपा में चली गयीं।
ऐसी परिस्थितियों में बसपा नीचे ही नीचे मुस्लिम दलित गठजोड़ का कार्ड खेल रही है। उसका संगठन ‘बामसेफ’ उसके लिए वैसे ही कार्य करता है जैसे भाजपा के लिए आर.एस.एस. कार्य करता है। बामसेफ दलितों को हिंदू समाज  से अलग ले जाकर उनमें ऐसे साहित्य का वितरण कर रहा है जो इस देश के लिए आगे चलकर बहुत ही घातक होगा। मुस्लिम यादव का (माई) गठजोड़ बनाकर सपा सरकार बनाने में सफल रही थी तो अब यह खेल मुस्लिम-दलित के रूप में सामने आ रहा है। मुस्लिमों को उनके शुभचिंतक संकेत दे रहे हैं कि ऐसे दल को वोट दें जो भाजपा को हरा सके। बात साफ है किउनकी नजरों में यदि सपा हार रही है तो फिर बसपा को आगे बढ़ाओ।
भाजपा ‘प्रभु राम’ के भरोसे है। वह श्रीराम नाम का प्रयोग चुनावों के समय करती है, और फिर उन्हें भूल जाती है। सारी राजनीतिक पार्टियां गठजोड़ बनाकर प्रदेश का उल्लू बनाने के षडय़ंत्रों का ताना-बाना बुनने में लग गयी हैं। कुछ लोग साम्प्रदायिक भावनाओं में बहकर तो कुछ जातिगत भावनाओं में बहकर इन षडय़ंत्रों के जाल में  फंसकर धु्रवीकरण करने की देशघाती प्रवृत्ति के वशीभूत होकर चुनावी शतरंज की बिसातें बिछाने लगे हैं। बात साफ है कि सरकार बनाकर अगले पांच वर्ष उत्तर प्रदेश को लूटना सबका लक्ष्य है। लोकहित और जनहित सारे खेल से गायब है।
ऐसे में कौन बनाएगा सरकार या कौन बनेगा मुख्यमंत्री का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण नही है, महत्वपूर्ण है कि उत्तर प्रदेश किसका हो? निश्चित रूप से उनका भी नही जो उत्तर प्रदेश बनाने की बात करते-करते स्वयं घरेलू कलह में फंसकर रह गये और ‘उल्टा प्रदेश’ बना बैठे, उनका भी नही जो आज तक द्वंद्व में फंसे खड़े हैं, उनका भी नही जो प्रदेश को सीधे-सीधे साम्प्रदायिक आधार पर और जातीय आधार पर बांटने की घिनौनी राजनीति में लग गये हैं और उनका भी नही जो प्रदेश के विकास के लिए कोई ठोस योजना न देकर भावनाओं को उकसाकर प्रदेश को लूटने का प्रमाण पत्र प्रदेश की जनता से लेना चाहते हैं। इस समय राजनीति के खिलाड़ी चाहे ‘कौन बनाएगा सरकार’ के प्रश्न का उत्तर देने की जुगत भिड़ा रहे हैं पर प्रदेश की जनता तो गंभीरता से यही विचार कर रही है कि उत्तर प्रदेश किसका हो? यदि लोगों के पास कोई पांचवां विकल्प भी हो तो वह सोच सकते हैं और अपना निर्णय उसके पक्ष में दे सकते हैं, पर जनता मजबूर है क्योंकि उसकी थाली में वही सड़ा-बुसा भोजन आने वाला है और उसे उसी में से अपने लिए ‘उत्तम’ चुनना है। पर क्या उसे उत्तम कहा जा सकता है जो स्वयं ही सड़ा बुसा हो?

उत्तर प्रदेश में अगली सरकार कौन बनाएगा और कौन बनेगा मुख्यमंत्री? यह प्रश्न इस समय सभी के मन-मस्तिष्क में रचा-बसा है। इस प्रश्न को हम जब उठाते हैं तो राजनीति आरंभ हो जाती है अर्थात कोई कहता है कि सपा के अखिलेश ही पुन: मुख्यमंत्री बनेंगे तो कोई कहता है कि अगली सरकार मायावती बनाने जा रही हैं, तो किसी का कहना होता है कि भाजपा अपने बलबूते  पर यू.पी. को जीतने जा रही है, दो चार लोग कांग्रेस को भी अगली सरकार बनाते देखने की बात करते आपको मिल जाएंगे। इन सबके अपने-अपने गुणा-भाग और जोड़-घटाव हैं, जिनके अनुसार ये लेाग अपनी पार्टी की सरकार बनाते हुए दीख जाते हैं।

वास्तव में भारत की राजनीति 1947 से ही एक गलत राह पर चली गयी थी और आज भी यह बहुत से निर्णय उसी गलत राह पर खड़े रहकर ही लेना चाहती है। इसने तुष्टिकरण और ‘वोट बैंक’ की राजनीति अपनाकर पहले दिन से ही गलत रास्ते पर जाने का संकेत दिया था और आज भी यह उसी अंधेरी गली में खड़ी हुई है। अल्पसंख्यकों के नाम पर जिन लोगों का ‘वोट बैंक’ कांग्रेस ने बार-बार भुनाया, उन्हें आधुनिक शिक्षा से काटकर ‘मजहबी तालीम’ के खूंटे से बांधे रखा, जिससे वे मजहबी दुनिया से बाहर निकलकर सोचने की शक्ति गंवाये रहें और देश की तथाकथित हिंदूवादी शक्तियों का डर दिखाकर उन्हें एक बनाये रखकर उनके वोट प्राप्त किये जाते रहें। इस प्रकार ये मुस्लिम अल्पसंख्यक जहां अपने कठमुल्लाओं से परेशान थे जो कि इन्हें मजहबी दुनिया से बाहर निकलने के हर दरवाजे को बंद करके बैठे थे और जो मुसलमानों का परिचय आधुनिक शिक्षा और विज्ञान से करा सकते थे, मुसलमानों के लिए वैसा ही प्रबंध भारत में कांग्रेस और उसकी समान विचारधारा की पार्टियों ने कर दिया, अर्थात ये कांगे्रस या उसकी विचारधारा के राजनीतिक दल मुसलमानों के लिए एक प्रकार से नये और ‘राजनीतिक कठमुल्ला’ पैदा हुए। जिन्होंने मुस्लिमों की मजहबी भावनाओं का जमकर प्रयोग किया। यह सच है कि मुस्लिमों को कंाग्रेस और उसकी समान विचारधारा के दलों ने केवल ‘वोट बैंक’ के रूप में ही प्रयोग किया है। सपा और बसपा दोनों कांग्रेस के दिखाये रास्ते पर आगे बढ़ीं और उन्होंने कांग्रेस से अपने आपको (मुस्लिमों के प्रति) कुछ अधिक ‘उदार’ दिखाते हुए और दो कदम आगे जाकर उनका तुष्टिकरण करना आरंभ कर दिया। सपा इसमें सबसे आगे चली गयी।

अब 2017 के चुनाव आसन्न हैं। इसके लिए फिर ‘वोट बैंक’ की राजनीति आरंभ हो गयी है। बड़ी तेजी से समाज में वोटों के धु्रवीकरण की प्रक्रिया तेज की जा रही है, भाजपा हर बार की भांति इस बार भी ‘राम’ की शरण में चली गयी है, और ‘रोम वाले’ अर्थात कांग्रेसी अभी-दोराहे पर खड़े हैं उनका नेतृत्व ही ऐसा है जो एक ठोस निर्णय लेकर द्वंद्व के दोराहे में फंसा खड़ा है। अभी तक का सारा खेल तो रीता बहुगुणा के भाजपा में शामिल होने से बिगड़ गया है। रीता बहुगुणा कांग्रेस की कद्दावर राजनीतिज्ञ रही हैं, उनमें सोचने-समझने और निर्णय लेने की क्षमता थी। पर पार्टी उनका सदुपयोग नही कर पायी और वह भाजपा में चली गयीं।

ऐसी परिस्थितियों में बसपा नीचे ही नीचे मुस्लिम दलित गठजोड़ का कार्ड खेल रही है। उसका संगठन ‘बामसेफ’ उसके लिए वैसे ही कार्य करता है जैसे भाजपा के लिए आर.एस.एस. कार्य करता है। बामसेफ दलितों को हिंदू समाज  से अलग ले जाकर उनमें ऐसे साहित्य का वितरण कर रहा है जो इस देश के लिए आगे चलकर बहुत ही घातक होगा। मुस्लिम यादव का (माई) गठजोड़ बनाकर सपा सरकार बनाने में सफल रही थी तो अब यह खेल मुस्लिम-दलित के रूप में सामने आ रहा है। मुस्लिमों को उनके शुभचिंतक संकेत दे रहे हैं कि ऐसे दल को वोट दें जो भाजपा को हरा सके। बात साफ है किउनकी नजरों में यदि सपा हार रही है तो फिर बसपा को आगे बढ़ाओ।

भाजपा ‘प्रभु राम’ के भरोसे है। वह श्रीराम नाम का प्रयोग चुनावों के समय करती है, और फिर उन्हें भूल जाती है। सारी राजनीतिक पार्टियां गठजोड़ बनाकर प्रदेश का उल्लू बनाने के षडय़ंत्रों का ताना-बाना बुनने में लग गयी हैं। कुछ लोग साम्प्रदायिक भावनाओं में बहकर तो कुछ जातिगत भावनाओं में बहकर इन षडय़ंत्रों के जाल में  फंसकर धु्रवीकरण करने की देशघाती प्रवृत्ति के वशीभूत होकर चुनावी शतरंज की बिसातें बिछाने लगे हैं। बात साफ है कि सरकार बनाकर अगले पांच वर्ष उत्तर प्रदेश को लूटना सबका लक्ष्य है। लोकहित और जनहित सारे खेल से गायब है।

ऐसे में कौन बनाएगा सरकार या कौन बनेगा मुख्यमंत्री का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण नही है, महत्वपूर्ण है कि उत्तर प्रदेश किसका हो? निश्चित रूप से उनका भी नही जो उत्तर प्रदेश बनाने की बात करते-करते स्वयं घरेलू कलह में फंसकर रह गये और ‘उल्टा प्रदेश’ बना बैठे, उनका भी नही जो आज तक द्वंद्व में फंसे खड़े हैं, उनका भी नही जो प्रदेश को सीधे-सीधे साम्प्रदायिक आधार पर और जातीय आधार पर बांटने की घिनौनी राजनीति में लग गये हैं और उनका भी नही जो प्रदेश के विकास के लिए कोई ठोस योजना न देकर भावनाओं को उकसाकर प्रदेश को लूटने का प्रमाण पत्र प्रदेश की जनता से लेना चाहते हैं। इस समय राजनीति के खिलाड़ी चाहे ‘कौन बनाएगा सरकार’ के प्रश्न का उत्तर देने की जुगत भिड़ा रहे हैं पर प्रदेश की जनता तो गंभीरता से यही विचार कर रही है कि उत्तर प्रदेश किसका हो? यदि लोगों के पास कोई पांचवां विकल्प भी हो तो वह सोच सकते हैं और अपना निर्णय उसके पक्ष में दे सकते हैं, पर जनता मजबूर है क्योंकि उसकी थाली में वही सड़ा-बुसा भोजन आने वाला है और उसे उसी में से अपने लिए ‘उत्तम’ चुनना है। पर क्या उसे उत्तम कहा जा सकता है जो स्वयं ही सड़ा बुसा हो?

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rajesh garg के द्वारा
November 12, 2016

राकेश जी आपने लिखा तो बहुत सही है परंतु हमे क्या करना चाहिए या फिर जो आप के हिसाब से गलत हो रहा है उसको सुधारने का क्या तरीका हो सकता है वो नहीं बताया, मेरे हिसाब से धर्मनिरपेछता को फिर से परिभाषित करने की अहम् आवश्यकता है. आरक्षण और पर्सनल लॉ समाप्त हो “एक हिंदुस्तान एक कानून” की अवधारणा लागू हो इलेक्शन में प्रचार का सारा खर्च इलेक्शन कमिशन द्वारा हो किसी भी प्रत्याशी को दो कार के अलावा किसी खर्चे की अनुमति न हो. हर किसी को ग्रेजुएट तक एजुकेशन फ्री हो. हर नागरिक को उसके कार्यदायी जीवन में दिए गए इनकम टैक्स के अनुपात में पेंशन दी जाये तभी हम काले धन की प्रवर्ती से बहार आ सकते हैं जिसका सीधा प्रभाव हमारी चुनाव प्रक्रिया पर होगा और कोई भी वर्ग केवल वोट बैंक नहीं बन पायेगा.


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